राष्ट्र के इतिहास के पुनर्निर्माण का एक शुभ प्रयास

अभिमत प्रस्तुतकर्ता:

“चारित्रिक नवलाचक्रवर्ती” (ऐतिहासिक उपन्यासों के सम्राट)

डॉ. मुदिगोंडा शिवप्रसाद

(सेवानिवृत्त प्रोफेसर, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद)

परम आदरणीय एवं प्रिय वैदिक विद्वान ब्रह्मश्री चिर्रावूरी शिवरामकृष्ण शर्मा जी को मेरा सादर प्रणाम।

मैंने आपके द्वारा तैयार किए गए नवीन ऐतिहासिक ग्रंथ का अध्ययन किया है। आपने इस मिथ्या धारणा का खंडन किया है कि भारत का अपना कोई इतिहास नहीं है और इसका इतिहास केवल विदेशियों द्वारा गढ़ा गया है। उन्होंने पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण से इस राष्ट्र को देखा और मनगढ़ंत कथाएँ प्रस्तुत कीं। औपनिवेशिक आक्रमणकारियों के लिए अपने अधीन राष्ट्रों को नीचा दिखाना तथा उनके इतिहास और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को विकृत करके उनमें हीनभावना उत्पन्न करना स्वाभाविक था।

वास्तविकता यह है कि ऋग्वेद संपूर्ण विश्व का सबसे प्राचीन साहित्यिक स्मारक है। हमारे अठारह पुराणों में प्रतीकात्मक कथाओं के साथ-साथ इतिहास का भी विपुल भंडार उपलब्ध है। उदाहरण के लिए, मत्स्य पुराण और वायु पुराण दोनों में सातवाहन वंश से संबंधित विवरण मिलते हैं।

धर्मराज से लेकर पृथ्वीराज तक कलियुग के शासकों की वंशावली का विवरण हमारे पुराणों में मिलता है। औपनिवेशिक इतिहासकार चंद्रगुप्त मौर्य और गुप्त वंश के चंद्रगुप्त के बीच अंतर करने में असफल रहे। उन्होंने “आर्य आक्रमण” के इर्द-गिर्द एक काल्पनिक इतिहास गढ़ा, जबकि आर्य इसी पवित्र भूमि के मूल निवासी थे। सिकंदर महान को पोरस ने पराजित किया था, फिर भी उसे विश्वविजेता के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसके अतिरिक्त, मदुरै का इतिहास तथा मुसुनूरी नायकों का इतिहास भी इतिहास की पुस्तकों से हटा दिया गया। छत्रपति शिवाजी को अपमानित किया गया, जबकि अकबर को “महान” के रूप में महिमामंडित किया गया। ऐसी कथाएँ पढ़ने वाले विद्यार्थियों में स्वाभाविक रूप से आत्म-संदेह और हीनभावना उत्पन्न होती है।

प्रिय शर्मा जी,

आपने इन राजवंशों के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए अत्यंत परिश्रम किया है। स्वतंत्रता के बाद स्वर्गीय श्री कोटा वेंकटाचलम् ने भी कुछ हद तक इसी प्रकार का प्रयास किया था। मेरी हार्दिक इच्छा है कि आपके इस शोध-कार्य को इंटरमीडिएट और डिग्री के विद्यार्थियों के लिए पाठ्यपुस्तक के रूप में अपनाया जाए।

जो व्यक्ति अपने पूर्वजों की महानता से अनभिज्ञ है, वह अपने चरित्र का निर्माण करने में भी सक्षम नहीं हो सकता।

आपकी समृद्ध वैदिक विद्वत्ता और ऐतिहासिक शोध-दृष्टि के अद्भुत समन्वय के लिए मेरी हार्दिक बधाई। इस महान राष्ट्र की जनता भारत के इतिहास के प्रति आपकी विद्वत्ता और गहन अंतर्दृष्टि के लिए आपकी ऋणी है।

प्रिय पाठकों,

रघुवंश अर्थात सूर्यवंश से हम महाकवि कालिदास और अन्य विद्वानों की रचनाओं के माध्यम से परिचित हैं। इसके उत्तराधिकारियों के नाम लेखक डॉ. शिवरामकृष्ण शर्मा जी ने प्रस्तुत किए हैं। कृपया महापद्म नंद के बाद की राजवंशीय वंशावली के विवरण का अध्ययन करें।

शायद हमारा देश ही इस दुर्भाग्य से ग्रस्त है कि वह अपने इतिहास से स्वयं अनभिज्ञ है। डॉ. चि. शिवरामकृष्ण शर्मा ने अब यह स्थापित किया है कि हमारी महान मातृभूमि का प्राचीन इतिहास 9,000 वर्षों से भी अधिक पुराना है।

  • क्या हम इस दावे से सहमत हैं कि विदेशी शासन से पहले भारत एकीकृत नहीं था?

  • क्या हम यह स्वीकार कर सकते हैं कि हिंदू धर्म की उत्पत्ति केवल चौथी शताब्दी ईस्वी में हुई?

  • क्या हम उन विद्वानों के इस दावे को स्वीकार करें कि मंदिरों का निर्माण केवल पहली शताब्दी ईस्वी के बाद ही प्रारंभ हुआ?

  • क्या हमें उन छद्म-धर्मनिरपेक्षतावादियों के आख्यानों को स्वीकार करना चाहिए, जो आत्म-संदेह और हीनभावना को जन्म देते हैं?

डॉ. शर्मा जी का यह प्रामाणिक ग्रंथ इन सभी प्रश्नों का दृढ़तापूर्वक उत्तर “नहीं” देता है।

प्रिय डॉ. शिवरामकृष्ण शर्मा जी,

आपके नाम में शिव, श्रीराम और श्रीकृष्ण का समावेश है। आज हम वाराणसी, अयोध्या और मथुरा में हुए ऐतिहासिक आक्रमणों के विषय में अधिक जागरूक हो रहे हैं। इन तथ्यों को प्रकाश में लाना हमारे महान राष्ट्र के प्रति आत्म-जागरूकता को बढ़ावा देता है।

हमारे पूर्वजों द्वारा ऐतिहासिक घटनाओं का काल-निर्धारण मुख्य रूप से खगोल विज्ञान पर आधारित था—एक ऐसी प्रणाली जिसे विदेशी विद्वान न तो समझ सके और न ही स्वीकार कर सके।

मुझे आशा है कि आप भारतीय इतिहास के नए अध्यायों को निरंतर उजागर और पुनर्निर्मित करते रहेंगे। आपका यह प्रस्तुतीकरण वैज्ञानिक, प्रामाणिक, कल्याणकारी और भारत के लिए अत्यंत हितकारी है।

शोभकृत, माघमास

01-03-2024, हैदराबाद

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