इतिहास में किए जाने वाले समावेश

वर्तमान में विद्यालयों और महाविद्यालयों की पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाए जाने वाले इतिहास में भारतीयों की विदेशी शासकों के हाथों हुई पराजयों को अधिक महत्व दिया गया है। इसके कारण हिंदू समाज में आत्महीनता और दास मानसिकता विकसित हुई, ऐसा कहा जाता है।

शिवाजी महाराज ने महाराष्ट्र में एक साम्राज्य की स्थापना की। उस महान वीर की जीवनी हमें गर्व, आनंद और रोमांच से भर देती है। किंतु इतिहास में प्रायः औरंगज़ेब के उस कथन का उल्लेख मिलता है जिसमें उसने छत्रपति शिवाजी को “पहाड़ों का चूहा” कहकर संबोधित किया था। उनकी महान विजयों को पर्याप्त रूप से प्रमुखता नहीं दी गई।

इतिहास की पुस्तकों में यह उल्लेख मिलता है कि दक्षिण भारत में श्रीकृष्णदेवराय के शासनकाल में अनेक कर लगाए गए थे। लेकिन तेलुगु साहित्य में उनके योगदान और उनके समय में संस्कृति की हुई प्रगति को इतिहास में पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया। उनकी महान उपलब्धियों के बारे में हमें अन्य स्रोतों से ही जानकारी प्राप्त करनी पड़ती है।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर भारतीय संविधान की रूपरेखा तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष थे। उनके नाम में भी ‘राम’ शब्द आता है। हमारे संविधान की मूल प्रति में रामायण से संबंधित चित्र भी हैं। महात्मा गांधी का जीवन रामनाम के स्मरण से भरा हुआ था। प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार, उन्होंने अंतिम समय में “हे राम” कहते हुए प्राण त्यागे। महान अभिनेता रामाराव के नाम में भी राम का नाम है। रामोजी द्वारा एक मुस्लिम नवाब को स्वप्न में दर्शन देकर गोपन्ना द्वारा किए गए ऋण का भुगतान करने की कथा भी प्रसिद्ध है।

यह सर्वविदित है कि गांधीजी “रामराज्य” की स्थापना चाहते थे। वीरब्रह्मेन्द्रस्वामी ने अपने प्रसिद्ध कालज्ञान तत्व गीतों में श्रीराम और युधिष्ठिर को धर्मपरायण शासकों के रूप में वर्णित किया है। यदि हम गिनना शुरू करें, तो हमारे समाज में श्रीराम कथा से जुड़े लाखों लोगों के नाम मिलेंगे। हमारे देश के लगभग प्रत्येक गांव में अनेक श्रीराम मंदिर पाए जाते हैं।

विश्व की अनेक भाषाओं में वर्णित श्रीराम कथा से संबंधित सभी विवरणों को एकत्र करके प्रस्तुत करना अपने आप में एक बहुत बड़ा कार्य है। इस विषय को पूर्ण रूप से प्रस्तुत करने के लिए विशाल साहित्यिक प्रयास की आवश्यकता होगी। फिर भी यह अत्यंत दुखद और आश्चर्यजनक है कि भारत के इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में श्रीराम का नाम दिखाई नहीं देता। क्या हम यह कह सकते हैं कि “पर्याप्त प्रमाण न होने के कारण श्रीराम को इतिहास में स्थान नहीं दिया गया?”