


श्रीकृष्ण महाभारत के केंद्रीय पात्र हैं। यह महान महाकाव्य वर्णन करता है कि उन्होंने समुद्र के मध्य भव्य द्वारका नगरी का निर्माण किया और युधिष्ठिर को तेरह द्वीपों अथवा भूभागों का सम्राट बनने के लिए मार्गदर्शन दिया। आज भगवद्गीता को परम सत्य का गहन संदेश देने वाले महान ग्रंथ के रूप में विश्वभर में सम्मान प्राप्त है। इसी प्रकार श्रीकृष्ण के जीवन-चरित्र का वर्णन करने वाला श्रीमद्भागवत विश्व के उन अनेक स्थानों पर व्यापक रूप से पढ़ा जाता है जहाँ इस्कॉन संस्थाएँ सक्रिय हैं। इतनी विशाल वैश्विक विरासत के बावजूद, इस महान राष्ट्र की आधिकारिक इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में उनके व्यक्तित्व और ऐतिहासिक उपस्थिति का उल्लेख नहीं मिलता।
इसके अतिरिक्त, अब यह ज्ञात हुआ है कि द्वारका की वर्तमान भूमि के नीचे एक और अधिक प्राचीन नगर दबा हुआ है। विष्णु पुराण में भी इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जहाँ कहा गया है कि रैवत नामक एक राजा ने कभी उसी स्थान पर अपनी राजधानी स्थापित की थी। यद्यपि ये पुरातात्त्विक और शास्त्रीय तथ्य लगभग चालीस वर्ष पहले ही प्रकाश में आ चुके थे, फिर भी विद्यालयों और महाविद्यालयों के इतिहास पाठ्यक्रमों में इन्हें आज तक स्थान नहीं मिला। इतना महत्वपूर्ण इतिहास आखिर क्यों छोड़ा जा रहा है?
यह एक प्रचलित और प्राचीन परंपरा है कि जिस क्षण श्रीकृष्ण ने अपना पार्थिव शरीर त्यागा, उसी क्षण कलियुग का आरंभ हुआ। यह दुःखद समाचार सुनने के बाद सम्राट युधिष्ठिर ने अपना सिंहासन त्याग दिया और अपनी अंतिम यात्रा, अर्थात् महाप्रस्थान, पर निकल पड़े। यह महत्वपूर्ण इतिहास महान महाकाव्य महाभारत के पृष्ठों में हमारे लिए सुरक्षित है।
शताब्दियों के दौरान भास और भट्टनारायण जैसे महान संस्कृत कवियों तथा नाटककारों ने इन घटनाओं को सुंदर और अमर काव्यों एवं नाटकों के रूप में प्रस्तुत किया। इसके अतिरिक्त, महाभारत के विभिन्न भारतीय भाषाओं में हुए अनुवादों ने अपार लोकप्रियता प्राप्त की और इस कथा को घर-घर में जीवित बनाए रखा। अपने धर्मपूर्ण शासन और उसके बाद हुए महाप्रस्थान के कारण युधिष्ठिर अपने स्वयं के ऐतिहासिक युग के अग्रदूत बने। फिर भी, इतने गहरे सांस्कृतिक और साहित्यिक प्रभाव के बावजूद, हमारे राष्ट्र के आधिकारिक इतिहास में सम्राट युधिष्ठिर का कोई उल्लेख दिखाई नहीं देता।