मुख्यधारा के इतिहास में पारंपरिक भारतीय कालगणनाओं की उपेक्षा
हाल ही में जब मैं 20वीं शताब्दी के केरल के कवि केशवपंडित द्वारा रचित दो संस्कृत ग्रंथों का तेलुगु में अनुवाद कर रहा था, तब मुझे कोलाभ्य शक के 1100वें वर्ष का एक उल्लेख मिला। इस अल्पपरिचित कालगणना को समझने के लिए मैंने तिरुपति स्थित श्री वेंकटेश्वर वैदिक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रानी सदाशिवमूर्ति से परामर्श किया। उन्होंने कृपापूर्वक भारतीय पारंपरिक शकों की एक विस्तृत सूची प्रदान की, जिसमें वर्तमान में 2079वें वर्ष में चल रहा कालचुरी शक और 1702वें वर्ष में चल रहा वलभी शक भी सम्मिलित हैं।
और गहराई से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि भारत की अपनी अनेक गहन और प्राचीन कालगणनाएँ रही हैं। इनमें से अनेक का विस्तृत उल्लेख दिवंगत विद्वान श्री कोटा वेंकटाचलम् के महान ऐतिहासिक शोधग्रंथ कली शक विज्ञानम् में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं:
युधिष्ठिर शक: यह 3138 ईसा पूर्व में सम्राट युधिष्ठिर के राज्याभिषेक को सूचित करता है, जो कलियुग के आरंभ से ठीक 36 वर्ष पूर्व था।
जयाभ्युदय शक: 3102 ईसा पूर्व में प्रारंभ हुआ, और उस काल को सूचित करता है जब महाभारत की रचना आरंभ हुई।
कली शक: 3102 ईसा पूर्व में कली युग के औपचारिक आरंभ की कालगणना।
सामान्य / लौकिक शक: श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान करने के तुरंत बाद प्रारंभ होने वाला काल।
युधिष्ठिर काल (सप्तर्षि कालरेखा): एक विशिष्ट ऐतिहासिक गणना, जिसे 3076 ईसा पूर्व पर चिह्नित किया जाता है, अर्थात् कली युग के आरंभ के ठीक 26 वर्ष बाद।
सप्तर्षि शक: एक प्राचीन खगोलीय और ऐतिहासिक कालगणना, जो युधिष्ठिर काल से निकट रूप से जुड़ी हुई है।
विक्रम संवत्: 57 ईसा पूर्व में सम्राट विक्रमादित्य द्वारा स्थापित युग।
शालिवाहन शक: 78 ईस्वी में प्रारंभ होने वाला व्यापक रूप से मान्य युग (जो कली कालगणना के 3180वें वर्ष के समतुल्य है)।
ये सभी भिन्न-भिन्न कालगणना प्रणालियाँ स्वभावतः भारत की विरासत का अंग हैं। किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व के नाम पर एक युग या शक का अस्तित्व ही उसके असाधारण प्रभाव और नेतृत्व का स्पष्ट प्रमाण है। यदि इन प्राचीन और दीर्घकाल से प्रचलित कालगणनाओं के मूल व्यक्तियों के नाम आधुनिक पाठ्यपुस्तकों में पूरी तरह अनुपस्थित और अनदेखे रह जाएँ, तो हमारे राष्ट्र का लिखित इतिहास पूर्ण इतिहास नहीं माना जा सकता।
